Short hindi stories with moral values naitik shiksha

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Short hindi stories – ईमानदारी की सीख

 

एक 8- 10 साल का लड़का राकेश अपनी दादी के साथ रिश्तेदारी में गया हुआ था। गर्मी का मौसम था , गांव में जगह-जगह आम के बगीचे थे। तरह तरह के आम बगीचे में लगे हुए थे जो काफी रसीले और मनमोहक थे।

दोपहर का समय था , सभी गांववासी विश्राम कर रहे थे , तभी बालकों की टोली सजी और आम के बगीचे की तरफ बढ़ी।  बालकों ने बगीचे में घुसकर आम तोड़े। राकेश शांत स्वभाव का था उसे इस प्रकार के कार्यों में रुचि नहीं थी , किंतु राकेश के मित्रों ने काफी उकसाया और प्रेरित किया कि वह भी आम तोड़े किंतु वह चुपचाप एक किनारे बैठा रहा।

Hindi kahaniya with moral values

तभी राकेश को बाग के दूसरी तरफ फुलवारी दिखी जिसमें तरह-तरह के फूल खिले हुए थे जो आकर्षक लग रहे थे। राकेश ने आगे बढ़कर एक फूल तोड़ लिया और अपनी जेब में रख लिया। माली को आभास हुआ उसके बगीचे में शरारती बच्चों की टोली घुसी हुई है। तत्काल माली घर से दौड़ता हुआ बाग की और आया माली को आता देख सभी बच्चे कूद कर भाग गए। राकेश को समझ में नहीं आया आखिर यह बच्चे क्यों भाग रहे हैं। वह खड़ा रहा माली ने राकेश को पकड़ लिया और उसका घर पूछ ले लगा –

‘ बता तेरा घर कहां है ? तेरे माता पिता कौन है ? तेरी शिकायत करूंगा ‘

बच्चे ने मायूस होकर कहा मेरे पिताजी नहीं है ! उस के स्वर में एक सच्चाई थी। माली सुनते हुए उसके भोलेपन पर प्रभावित हुआ और समझाया कि जब तुम्हारे माता-पिता नहीं है तो तुम्हें पिटाई से कौन बचाएगा ? इसलिए तुम्हें अन्य लड़कों की तरह इस प्रकार की शरारत नहीं करनी चाहिए। अगर तुम्हें कोई चीज पसंद आ जाए तो , उसके मालिक से मांग लेना चाहिए , किंतु चोरी नहीं करनी चाहिए।

राकेश को ऐसा आभास हुआ जैसे माली ने उसे जीवन का एक रास्ता दिखा दिया हो। राकेश ने उस दिन से ठान लिया वह उन सभी कारणों को त्याग देगा जो उचित ना हो। उस दिन से राकेश केवल उचित कार्य  और सत्य के प्रति दृढ़ संकल्प रहने लगा। आगे चलकर राकेश बहुत बड़ा स्वतंत्रता सेनानी बना और प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में अध्यापन का कार्य भी किया।

नैतिक शिक्षा –

मनुष्य जब निश्चित कर लेता है उसे प्राप्त अवश्य करता है जरुरत रहती है केवल उचित राह की।

 

नील के दाता किसान की कहानी – Best short hindi stories

 

कोलकाता के हावड़ा स्टेशन पर घुटनों तक धोती पहने मुस्कुराते हुए एक आदमी गांधी जी का स्वागत करने पहुंचा। जैसे ही गांधीजी उसके करीब पहुंचे उसने जल्दी से अपना परिचय दिया – ” जी मैं राजकुमार शुक्ल ”

गांधी जी ने उन्हें एक नजर देखा और बोले – जाना ही होगा चंपारण ?

अंग्रेजों का जुनून बहुत बढ़ गया है , और चंपारण के लोगों को बस आप का सहारा है। राजकुमार जी बड़ी विनम्रता से बोले , लेकिन उनकी बातों में दृढ़ विश्वास था।

गांधीजी ना नहीं कर सकते और चल पड़े। चंपारण नील की खेती के विरोध में अंग्रेजो के खिलाफ लड़ने।

चंपारण वासियों को तीन कठिया नियम के तहत हर एक बीघा जमीन में नील की खेती करना जरूरी था। नील की खेती से जमीन बंजर हो जाती थी और मुआवजा घटता जा रहा था। अंग्रेज मालामाल हो रहे थे , और किसान बेहाल। इनकार करने से कोड़े खाने पड़ते सो अलग।

1917 में गांधी जी चंपारण के भित्तिहरण आश्रम आए और सत्याग्रह आंदोलन से चंपारण के किसानों को अंग्रेजों से आजादी दिलाई।

इस आंदोलन में सतवारिया गांव के छोटे किसान राजकुमार शुक्ल के योगदान को कभी नहीं भुला सके। अगर वह गांधीजी के पीछे नहीं पड़ते और उन्हें चंपारण आने पर मजबूर नहीं करते तो शायद आज देश का इतिहास कुछ और ही बयां कर रहा होता।

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